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Wednesday, July 31, 2019

Human Rights in Islam-Part-2 इस्लाम में मानव अधिकार


कनीज़ फातमा, न्यू एज इस्लाम
इंसानी जान के खून की हुरमत
अल्लाह पाक का इरशाद है:
مِنْ أَجْلِ ذَٰلِكَ كَتَبْنَا عَلَىٰ بَنِي إِسْرَائِيلَ أَنَّهُ مَن قَتَلَ نَفْسًا بِغَيْرِ نَفْسٍ أَوْ فَسَادٍ فِي الْأَرْضِ فَكَأَنَّمَا قَتَلَ النَّاسَ جَمِيعًا وَمَنْ أَحْيَاهَا فَكَأَنَّمَا أَحْيَا النَّاسَ جَمِيعًا ۚ وَلَقَدْ جَاءَتْهُمْ رُسُلُنَا بِالْبَيِّنَاتِ ثُمَّ إِنَّ كَثِيرًا مِّنْهُم بَعْدَ ذَٰلِكَ فِي الْأَرْضِ لَمُسْرِفُونَ ﴿٣:۵﴾
अनुवाद: इसी वजह से हमने बनी इस्राइल पर (नाज़िल की गई तौरात में यह आदेश) लिख दिया (था) कि जिसने किसी व्यक्ति को बिना किसास के या ज़मीन में फसाद (फैलाने अर्थात खूँ रेज़ी और डाका जनी आदि की सजा) के (बिना हक़) क़त्ल कर दिया तो गोया उसने (समाज के) सारे लोगों को कत्ल कर दिया और जिसने उसे (नाहक मरने से बचा कर) जीवित रखा तो गोया उसने (समाज के) सारे लोगों को जीवित रखा (अर्थात उसने इंसानी जीवन का सामूहिक निज़ाम बचा लिया), और बेशक उनके पास हमारे रसूल स्पष्ट निशानियाँ ले कर आए फिर (भी) उसके बाद उनमें से अक्सर लोग यक़ीनन ज़मीन में हद से आगे बढ़ने वाले हैंl (सुरह मायदा ५:३२)
इमाम अबू मंसूर मात्रीदी इस आयत की व्याख्या करते हुए फरमाते हैं:
من استحل قتل نفس حرم الله قتلها بغير حق، فكأنما استحل قتل الناس جميعا، لأنه يكفر باستحلاله قتل نفس محرم قتلها، فكان كاستحلال قتل الناس جميعا، لأن من كفر بآية من كتاب الله يصير كافرا بالكل".........
وتحتمل الآية وجها آخر، وهو ما قيل: إنه يجب عليه من القتل مثلما أنه لو قتل الناس جميعا. ووجه آخر: أنه يلزم الناس جميعا دفع ذالك عن نفسه ومعونته له، فإذا قتلها أو سعى عليها بالفساد، فكأنما سعى بذالك على الناس كافة........وهذا يدل أن الآية نزلت بالحكم في أهل الكفر وأهل الإسلام جميعا، إذا سعوا في الأرضا بالفساد. (تأويلات أهل السنة للإمام أبي منصور الماتريدي: 3:501)
अनुवाद: जिसने किसी ऐसी जान का क़त्ल हलाल जाना जिसका नाहक कत्ल करना अल्लाह पाक ने हराम कर रखा है तो गोया उसने सारे लोगों के क़त्ल को हलाल जाना, क्योंकि ऐसी जान जिसका कत्ल हराम है वह व्यक्ति उसके कत्ल को हलाल समझ कर कुफ्र का दोषी हुआ है, वह ऐसे ही है जैसे उसने सारे लोगों के कत्ल को हलाल जाना, क्योंकि जो शख्स किताबुल्लाह की एक आयत का इनकार करता है वह पूरी किताब का इनकार करने वाला हैl
“इस आयत की (सुरह मायदा ५:३२) एक और तौजीह है और वह यह कि कहा गया है कि किसी जान के क़त्ल को हलाल जानने वाले पर सारे लोगों के क़त्ल का गुनाह लाज़िम आएगा (क्योंकि उसने इंसानियत के एक फर्द को कत्ल कर के गोया उसने पूरी इंसानियत पर हमला किया है)l
“एक तौजीह यह भी है कि सारे लोगों पर लाज़िम है कि सामूहिक प्रयास के साथ उस जान को कत्ल से बचाएं और उसकी मदद करेंl पास जब वह उनको कत्ल करके फसाद बपा करने की कोशिश करेगा तो गोया वह पूरी इंसानियत पर फसाद बपा करने की कोशिश करता है_____और यह चीज दलालत करती है कि यह आयत इस हुक्म के साथ सारे अहले कुफ्र और अहले इस्लाम के लिए नाज़िल हुई है जबकि वह फसाद फिल अर्ज़ के लिए सरगर्दां हों” (تأويلات أهل السنة للإمام أبي منصور الماتريدي: 3:501)
इमाम अबू हफ्स हम्बली अपनी तफ़सीर “अल बाब फी उलूमिल किताब “ में बयान करते हैं:
१- हज़रत मुजाहिद ने फरमाया: जिस व्यक्ति ने एक जान को भी नाहक कत्ल किया तो वह इस कत्ल के सबब दोज़ख में जाएगा, जैसा कि वह तब दोज़ख में जाता अगर वह सारी इंसानियत को कत्ल कर देता (अर्थात उसका दोज़ख का अज़ाब ऐसा होगा जैसे उसने पूरी इंसानियत को कत्ल कर दिया हो)
आगे कहते हैं कि अल्लाह के इस फरमान (انما جزاء الذین یحاربون اللہ) में हर वह व्यक्ति शामिल है जो इन बुरे गुणों का मालिक हो चाहे वह मुस्लिम हो या काफिरl यह नहीं कहा जाएगा कि यह आयत कुफ्फार के हक़ में नाज़िल हुई क्योंकि एतेबार शब्द के सामान्य अर्थ का होता है ना कि ख़ास सबब काl (अल बाब फी उलूमिल किताब, ७:३०१)
अल्लाह पाक का इरशाद है
وَلَا تَقْتُلُوا النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ ۗ وَمَن قُتِلَ مَظْلُومًا فَقَدْ جَعَلْنَا لِوَلِيِّهِ سُلْطَانًا فَلَا يُسْرِف فِّي الْقَتْلِ ۖ إِنَّهُ كَانَ مَنصُورًا ﴿٣٣:۱۷﴾
और तुम किसी जान को कत्ल मत करना जिसे (कत्ल करना) अल्लाह ने हराम करार दिया है सिवाए इसके कि (उसका कत्ल करना शरीअत की रू से) हक़ हो, और जो शख्स ज़ुल्म से क़त्ल कर दिया गया तो बेशक हम ने उसके वारिस के लिए (किसास का) हक़ मुकर्रर कर दिया है इसलिए वह भी (किसास के तौर पर बदले के) कत्ल में हद से आगे ना बढ़े, बेशक वह (अल्लाह की तरफ से) मदद पाए हुआ है (इसलिए उसकी मदद व हिमायत की जिम्मेदारी हुकूमत पर होगी) (सुरह अल इसरा: १७:३३)
अल्लाह पाक का इरशाद है:
وَالَّذِينَ لَا يَدْعُونَ مَعَ اللَّهِ إِلَهًا آخَرَ وَلَا يَقْتُلُونَ النَّفْسَ الَّتِي حَرَّمَ اللَّهُ إِلَّا بِالْحَقِّ وَلَا يَزْنُونَ ۚ وَمَن يَفْعَلْ ذَٰلِكَ يَلْقَ أَثَامًا
अनुवाद : और (यह) वह लोग हैं जो अल्लाह के साथ किसी दोसरे माबूद की पूजा नहीं करते और ना ही किसी ऐसी जान को कत्ल करते हैं जिसे बिना हक़ मारना अल्लाह ने हराम फरमाया है और ना (ही) बदकारी करते हैं, और जो शख्स यह काम करेगा वह गुनाह की सज़ा पाएगा (२५:६८)
अल्लाह पाक का इरशाद है: إِنَّ الَّذِينَ فَتَنُوا الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ ثُمَّ لَمْ يَتُوبُوا فَلَهُمْ عَذَابُ جَهَنَّمَ وَلَهُمْ عَذَابُ الْحَرِيقِ
अर्थात: बेशक जिन लोगों ने मोमिन मर्दों और मोमिन औरतों को तकलीफ दी फिर तौबा (भी) नहीं की तो उनके लिए जहन्नम का अज़ाब है और उनके लिए (विशेषतः) आग में जलने का अज़ाब है (८५:१०)
कुछ मुफ़स्सेरीन इस आयत (८५:१०) की तफ़सीर में फरमाते हैं कि यहाँ फितने में मुब्तिला करने से आग में जलाना भी मुराद लिया गया हैl मुफ़स्सेरीन के इस अर्थ की रू से देखा जाए तो मौजूदा दौर में होने वाले खुद काश हमलों, बम धमाकों, और बारूद से आम नागरिकों को जला कर मार देने वाले फितना परवर लोग अज़ाब के हकदार हैंl
(बाकी इंशाअल्लाह)

Meaning of the terms Spirit and Throne in the Quran कुरआन में अर्श, रूह और कुर्सी का मफहूम



सुहैल अरशद, न्यू एज इस्लाम
कुरआन और दोसरे सभी आसमानी सहिफों में खुदा को निरंकार, बेमाहीत और लतीफ कहा गया हैl उसकी ज़ात को ना देखा जा सकता है, ना अंदाजा किया जा सकता है और ना उसे अक्ल पा सकती हैl उसे किसी भी माद्दी सूरत से पहचाना नहीं जा सकताl मगर इसके साथ ही साथ कुरआन यह भी कहता है कि वह सुनने, देखने, तदबीर करने और तखलीक करने और तबाह करने की सलाहियत रखता हैl इसी लिए कुरआन खुदा के संबंध में कहता है कि
فطرت اللہ التی فطرنا الناس علیہا
अल्लाह की फितरत वही है जिस पर उसने इंसान को बनाया (अल रूम:३०)
कुरआन को खुदा ने आँख, कान, नाक, हाथ और अक्ल दी जिसकी मदद से वह महसूस करता है, दोसरे जरूरी कार्य अंजाम देता है और गौर व फ़िक्र करता हैl मगर उसका देखना, उसका महसूस करना अंगों का कृतज्ञ है जबकि खुदा का देखना, सोचना, महसूस करना और बोलना अंगों का कृतज्ञ नहीं हैl वह असबाब का मोहताज नहींl कुरआन की एक आयत है
لیس کمثلہ شئی  و ھوالسمیع البصیر (الشوری ٰ:۱۱
वह किसी चीज से मुमासिल नहीं है और वह समीअ और बसीर हैl
इस सबके बावजूद कुरआन में कुछ ऐसी आयतें हैं जिससे उपर्युक्त आयतों के मफहूम में पेचीदगी होती हैl क्योंकि इन आयतों में खुदा को इंसानी गुणों का हामिल बताया गया है जैसे:
“और बनाया हमने आसमान हाथ के बल से” (अल ज़ारियात: ४७)
फिर जब ठीक बना चुको और फूंको उसमें अपनी रूह तो तुम गिर पड़ो उसके आगे सजदे मेंl” (साद: २७)
अल्लाह की मुट्ठी में ज़मीन और आसमान दाहिने हाथ में लिपटा होगा क़यामत के दिन (अल ज़ुम्र: ७६)
यही नहीं हज़रात आदम अलैहिस्सलाम की तखलीक के बाद खुदा का फरिश्तों को उन्हें सजदा करने का आदेश और फिर शैतान का इनकार करना और इसके बाद खुदा और शैतान के बीच जो मुकालमा है वह भी पाठक के मस्तिष्क में उलझन पैदा करता हैl कुरआन में और भी कई आयतें और स्थितियां हैं जहां खुदा और बंदों और खुदा और फरिश्तों के बीच मुकालमा होता हैl इन आयतों से खुदा के वजूद की ताफ्हीम में इंसान को मुश्किलें पेश आती हैंl
इसके अलवा खुदा जो लैसा क मिस्लिही (जिसके जैसा कोई नहीं) है उसके लिए अर्श और कुर्सी का भी उल्लेख कुरआन में हैl कुरआन कहता है कि खुदा अर्श पर बिराजमान है और उसका अर्श बहोत बड़ा और विस्तृत हैl अर्श से संबंधित कुरआन में निम्नलिखित आयतें हैं:
“वह बड़ा मेहरबान अर्श पर कायम हुआl” (ताहा:५)
“जिसने बनाए आसमान और ज़मीन और जो कुछ इसके बीच में है छः दिन में फिर कायम हुआ अर्श परl” (अल फुरकान: ९५)
“बेशक तुम्हारा रब अल्लाह है जिसने पैदा किये आसमान और ज़मीन छः दिन में फिर करार पकड़ा अर्श परl” (अल आराफ़: ४५)
वही है ऊँचे दर्जों वाला मालिक अर्श काl” (अल मोमिनून: ५१)
“उसका अर्श पानी पर थाl” (हूद:७)
अल्लाह वही है जिसने बनाए आसमान और ज़मीं और जो कुछ इसके बीच है छः दिन में फिर कायम हुआ अर्श परl (अल सजदा: ४)
“और उस दिन आठ फरिश्ते तुम्हारे रब के तख़्त को उठाएं गे” (अल हाक्का:७१)
एक आयत में अर्श के लिए कुर्सी का शब्द भी प्रयोग किया गया है
“उसके कुर्सी की वुसअत आसमान से ज़मीन तक है” (अल बकरा: ३५२)
कुछ हदीसों में खुदा के अर्श को चार फरिश्तों के जरिये थामने का उल्लेख हैl और कुरआन में उल्लेखित है कि कयामत के दिन आठ फ़रिश्ते अर्श को उठाए हुए होंगेl
सवाल यह पैदा होता है कि जब खुदा किसी के जैसा नहीं है और वह दिखाई भी नहीं देता और उसका माद्दी वजूद भी नहीं है अर्थात वह किसी भी माद्दा से बना हुआ नहीं है तो फिर उसके लिए अर्श पर कायम होना का क्या मफहूम हैl’
अर्श पर खुदा के कायम होने से यह साबित नहीं होता कि अर्श पर कायम खुदा की कोई जिस्मानी हैयत है, अर्श पर वह कायम हुआ मगर कायम होने वाली ज़ात को अब भी सेगा ए राज़ में रखा गया हैl लेकिन बहर हाल, अर्श पे कोई ज़ात है जरुर जिसकी हैयत के संबन्ध में कुरआन खामोश हैl उसी ज़ात को बौद्ध धर्म में शौन्य कहा गया हैl आयतल कुर्सी में कहा गया है कि उसकी कुर्सी ज़मीन स्व आसमान तक मुहीत हैl इस आयत से तो यह मफहूम लिया जा सकता है कि खुदा की कुदरत ज़मीन से आसमान तक फैली हुई है और वह सारी कायनात का मालिक हैl कोई भी चीज उसके इख्तियार के दायरे से बाहर नहीं हैl कुरआन में कई जगहों पर रूह का ज़िक्र और कम से कम दो मौकों पर रूहुल कुदुस का ज़िक्र हैl जब मदीने के यहूदियों ने हज़रत मोहम्मद मुस्तुफा सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम से पूछा था कि रूह क्या है तो यह आयत उतरी:
तुझसे पूछते हैं रूह को, कह दे कि रूह है मेरे रब के हुक्म सेl और तुमको इल्म दिया है थोड़ा साl” (बनी इस्राईल: ५४)
कयामत के दिन रूह भी खुदा के आगे हाथ बाँध कर खड़ी होगीl
“जिस दिन खड़ी हो रूह और फरिश्ते कतार बाँध करl (अल अम्बिया:८३)
“चढ़ेंगे उसकी तरफ फरिश्ते और रूह उस दिन जिसका तूल है पचास हज़ार सालl” (अल मेराज-४)
“और फूंकी उसमें अपनी रूह” (अल सजदा:९)
अगर हम वेदों और उपनिषदों के दृष्टिकोण से देखें तो उनके यहाँ हकीकी खुदा तो निरंकार और सिफात से आरी है मगर उसने अपनी ताकत से अपना एक तबई कायम मुकाम बना दिया है जो इंसानी सिफात का हामिल हैl खुदाए हकीकी गैब के पर्दे में रह कर अपने उसी कायम मुकाम के जरिये से कायनात के सभी मामलों को देखता हैl उसे ब्रहम या हिरन्य गर्भ कहते हैंl हिरन्य गर्भ का अर्थ है Golden Wombl इसी हिरन्य गर्भ या ब्रह्मा से सारे कायनात की तखलीक हुई और इसके अन्दर ख़ालिक, पालनहार और तबाह करने वाली तीनों सिफात हैंl कुरआन जब रुहुल कुदुस कहता है तो गालिबन उससे मुराद यही हिरन्य गर्भ या ब्रह्मा है जो खुदा का तबई कायम मुकाम है और खुदा अपनी सारी मख्लुकात से उसी तबई कायम मुकाम के जरिये से interact करता हैl और जो मखलूक जिस सतह की होती है उसी की भाषा में बात करता हैl किसी भी मखलूक की यह ताकत नहीं कि वह सीधे खुदा से बात कर सके इसलिए जब हम कुरआन में देखते हैं कि वह शैतान से, आदम अलैहिस्सलाम की तखलीक के बाद बात करता है, या मूसा से कोहे तूर पर या मैदाने तुवा में इंसानों की भाषा में बात करता है, या हज़रात मरियम अलैहिस्सलाम को हमाल की हालत में खजूर के पेड़ को हिलाने की हिदायत इंसानों की भाषा में करता है तो असल में वह अपने तबई कायम मुकाम अर्थात रुहुल कुदुस या हिरन्य गर्भ या ब्रह्मा की शकल में बात करता हैl चूँकि ब्रह्मा या रुहुल कुदुस या हिरन्य गर्भ खुदाए हकीकी हैं इसलिए वह सब कयामत के दिन खुदा के सामने दस्त बस्ता खड़े होंगेl वेद या उपनिषद में ब्रह्मा या हिरन्य गर्भ के वजूद को विस्तार से बयान कर दिया गया है इसलिए वहाँ कोई कंफ्यूज़न नही हैl कुरआन में मुफ़स्सेरीन ने इस बिंदु पर अधिक ध्यान नहीं दिया हालांकि इस कंफ्यूज़न को दूर करना उनकी इल्मी जिम्मेदारी थी वरना कुरआन की आयतें self contradcitory मालुम होती हैं जबकि ऐसा नहीं हैl रुहुल कुदुस से मुराद खुदा का तबई कायम मुकाम है जो खुदा नहीं है बल्कि अपनी मख्लुकात से अपनी हकीकी ज़ात को छिपाए रखते हुए सम्पर्क रखने की एक हिकमत हैl उसी रुहुल कुदुस के जरिये से खुदा अपनी आला तरीन और अदना तरीन मखलूक से राबता रखता हैl वह कीड़ों और जानवरों से उनकी ज़हनी साथ और जुबान में बात करता है और इंसानों से उनकी ज़हनी साथ के लिहाज़ से उनकी भाषा में बात करता हैl फरिश्तों से intract करने का अवश्य कोई और तरिका होगाl इसलिए, खुदा जब कुरआन में कहता है कि वह लतीफ है और उसके जैसा कोई नहीं तो वह खुद अपनी ज़ात की हकीकत बयान करता है और जब वह खुद को इंसानी सिफात में ज़ाहिर करते हुए इंसान से मुकालमा करता है तो असल में वह नहीं बल्कि उसका तबई कायम मुकाम मुकालमा करता हैl इस दृष्टिकोण से दोनों तरह की आयतों को देखें तो फिर मफहूम का कंफ्यूज़न दूर हो जाता हैl यह समझना कि आदम अलैहिस्सलाम को सजदा करने के मामले में खुदा शैतान जैसी अदना मखलूक से बहस करता है खुद खुदा की इज्ज़त व जलाल की तौहीन हैl

Jihad does Not mean war or Fighting कुरआन के उर्दू अनुवादों में किताल और जिहाद को एक ही अर्थ में बयान किया गया है जो गुमराह करने वाले हैं




सुहैल अरशद, न्यू एज इस्लाम
इस्लाम के शुरू के दिनों में पैगम्बरे इस्लाम और उनके अनुयायियों को मक्का के मुशरिकीन और यहूदियों से सख्त प्रतिरोध का सामना थाl कुफ्फार व मुशरिकीन के हाथों उन्हें काफी कष्ट और मुसीबतें उठानी पड़ींl इसके बावजूद वह ईमान पर कायम रहे और सभी तकलीफों को सब्र व रज़ा से बर्दाश्त कियाl फिर भी जब मुशरिकीन और यहूदियों की रेशा दवानियां हद से अधिक बढ़ गईं और नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की जान को खतरा हो गया तो उन्होंने मक्का से मदीना को हिजरत का फैसला कियाl और हज़रात मोहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने जां निसारों के साथ मदीना स्थानांतरित हो गएl मगर यहाँ भी उन्हें यहूदियों और मुशरिकीन की साजिशों का सामना करना पड़ाl यहाँ जब मुस्लिमों की संख्या अधिक हो गई और मुशरिकीन जब फैसला कुन जंग पर आमादा हो गए तो मुसलमानों ने जंग भी की और उन जंगों में उन्हें अल्लाह की मदद से फतह भी हासिल हुईl कुरआन में इन जंगों के संदर्भ में दर्जनों आयतें नाज़िल हुईं जिनमें मुसलमानों को जंग के दिनों में अपने अस्तित्व और अपनी सुरक्षा के लिए जंग की हिदायत की गईl इसके साथ ही मुसलमानों को कई मौकों पर सुलह की भी तलकीन की गई और मुसलमानों ने अपने दिल पर जबर कर के मुशरिकीने मक्का से सुलह भी कीl मुसलमान हर मौके पर अपनी तरफ से पूरी कोशिश करते थे कि जंग ना हो और शांतिपूर्ण तरीके से हर मामला तय हो जाएl इसके लिए उन्होंने हर रणनीति विकल्प की और सब्र कियाl हिजरत से पहले पैगम्बरे इस्लाम ने ताएफ में दीन की तबलीग के लिए पत्थर भी खाए और गालियाँ भी सुनीं और अल्लाह की रज़ा के लिए सब्र कियाl
कुरआन में मुसलमानों को दीन के प्रचार और इसके अस्तित्व के लिए मेहनत करने और कुर्बानी पेश करने की तलकीन की है और इसके लिए बड़े बदले की बशारत दी हैl मुसलमानों को दीन के प्रचार प्रसार और तौहीद के संदेश को जनता तक पहुंचाने के लिए हर तरह से मेहनत और संघर्ष करने की हिदायत दी हैl कुरआन मुसलमानों को दीन का प्रचार प्रसार शांतिपूर्ण ढंग से हिकमत और सब्र के साथ करने की तलकीन की हैl और इसके लिए जान और माल दोनों की कुर्बानी पेश करने की हिदायत दी हैl कुरआन में इस मेहनत और संघर्ष के लिए दो इस्तेलाह प्रयोग किये हैl एक है किताल और दोसरी जोह्दl किताल से मुराद जंग जिसमें मुसलमान या तो दुश्मनों को क़त्ल करें या फिर क़त्ल हों और यह आयतें अधिकतर हुजुर पाक की ज़िन्दगी में हिजरत के बाद नाज़िल हुईं जब मुसलमानों के सामने अस्तित्व का मसला था और जब मुशरिकीन ए मक्का मुसलमानों का सफाया करने के डॉ पे थेl दोसरी इस्तिलाह जोह्द या जिहाद की है जो मुसलमानों के लिए हर ज़माने में अमल के काबिल है और इसका अर्थ है दीन के प्रचार प्रसार के लिए संघर्ष करनाl दीन की राह में तकलीफ उठाना, माल और दौलत की कुर्बानी पेश करना, और शांतिपूर्ण तरीके से दीन के प्रचार प्रसार का काम करना यह सब जिहाद या जोह्द के अन्दर आते हैंl कुरआन में यह दोनों इस्तिलाहात मौके की मुनासिबत से प्रयोग हुए हैं मगर बदकिस्मती से दोनों इस्तिलाहात का उर्दू अनुवाद अधिकतर आयतों में एक ही अर्थ में अर्थात जंग के अर्थ में प्रयोग किया गया हैl जिससे आम मुसलमानों बल्कि अतिवादियों के एक वर्ग में भी यह तास्सुर आम हो गया कि जिहाद या जोह्द क़िताल का समानार्थक है जहां जहां भी जिहाद का उल्लेख आया है वहाँ मुसलमानों को मुशरिकीन और गैर मुस्लिमों से जंग करने और उन्हें क़त्ल करने की हिदायत की गई हैl निम्न में दोनों इस्तिलाहात की मिसालें पेश की जा रही हैं और इनमें अनुवाद की वजह से मफहूम में परिवर्तन के नमूने पेश हैंl
सबसे पहले शब्द क़िताल वाली आयतें पेश हैं जो जंग के ज़माने में उतरी हैं:
و قاتلو ا فی سبیل اللہ (البقرہ: 244
“और लड़ो अल्लाह की राह मेंl”
यह आयत जंग के मैदान में उतरी जब मुशरिकीने मक्का और मुसलमानों में लड़ाई हो रही थी और मुसलमानों को उनसे बहादुरी से लड़ने की तलकीन की गईl
فلما کتب علیہم القتال  تولوا الاّقلیلاً منہم  (البقرہ:246
फिर जब उनको हुक्म हुआ लड़ाई का तो वह सब फिर गए मगर थोड़े से उनमेंl
قاتلوا فی سبیل اللہ (آل عمران: 167
अल्लाह की राह में जंग करोl
یقاتلوں فی سبیل اللہ  (النساء: 76
लड़ते रहो अल्लाह की राह में
فقاتل فی سبیل اللہ (النساء: 84
सो तू लड़ अल्लाह की राह में
इस तरह की दर्जनों आयतें हैं जो जंग के जमाने में मुसलमानों को लड़ाई की तरगीब देती हैंl और इन आयतों में जंग के लिए किताल और उससे मुशतक़ शब्द का प्रयोग हुआ हैl मगर कुरआन में दर्जनों आयतों में शब्द जोह्द और इससे मुशतक़ शब्द जैसे जाहिदु, मुजाहिदून, मुजाहिदीन आदि का प्रयोग हुआ हैl कुरआन में केवल एक आयत में शब्द जिहाद का प्रयोग हुआ हैl इन सभी आयतों में दीन की इशाअत और हिफाज़त के लिए संघर्ष करने, कुर्बानी पेश करने, माल और जान की कुर्बानी देने और तकलीफ पर सब्र करने की तलकीन की गई हैl इन आयतों से लाज़मी तौर पर जंग का मफहूम नहीं निकलता हैl हाँ कभी कभी दीन की राह में निकलने वालों को hostility का सामना करना पड़ सकता है और उन्हें अपने बचाव में हथियार उठाना पड़ सकता हैl मगर जिहाद का अर्थ केवल जंग नहीं हैl यही अंतर क़िताल और जिहाद के मफहूम में हैl मगर कुरआन के उर्दू अनुवादों में जोह्द या जिहाद का अर्थ हर जगह लड़ाई या जंग किया गया हैl कुछ मिसालें पेश हैं:
बेशक जो लोग ईमान लाए और हिजरत की और लड़े (जाह्दु) अल्लाह की राह में (अल बकरा: २१८)
इस आयत में शब्द जाह्दु का अनुवाद ‘लड़े’ अर्थात जंग की, किया गया जबकि इस आयत का मफहूम यह है कि जो लोग ईमान लाए और मुसलमान हुने के बाद जो भी तकलीफें उन्हें दीन की राह में उठानी पड़ीं वह उन्होंने उठाईl उन्होंने तकलीफें सहीं, हिजरत की और हिजरत की तकलीफें बर्दाश्त कीं और इस दौरान अगर उन्हें लड़ना पड़ा तो अपनी बका के लिए और दीन की रक्षा के लिए जंग भी कीl मगर इस आयत में जोह्द का अनुवाद लड़ाई कर देने से मफहूम यह हो गया कि जो भी मुसलमान हुआ उस पर हर हालत में जंग में व्यस्त रहना फर्ज़ हो गयाl एक और आयत है:
बराबर नहीं बैठ रहने वाले मुसलमान जिनको कोई उज्र नहीं हौर वह मुसलमान जो लड़ने वाले (मुजाहिदून) हैं अल्लाह की राह में अपने माल से और जान से (अल निसा: ९५)
इस आयत में मुजाहिदून उनको कहा गया है जो अल्लाह की राह में संघर्ष करते हैं माल से और जान सेl इसलिए, दीन की इशाअत में माल खर्च करने वाला भी मुजाहिद है अर्थात संघर्ष करने वाला हैl वह व्यक्ति भी जो अल्लाह की राह में या दीन की इशाअत के लिए घर से निकला हो वह भी मुजाहिद हैl इस आयत से लाज़मी तौर पर जंग करने वाला नहीं है मगर अनुवाद से यही मफहूम मिलता हैl
जो लोग ईमान लाए और घर छोड़ा (युहाजिरू) और लड़े (जाह्दु) अपने माल और जान से अल्लाह की राह में और जिन लोगों ने जगह दी और मदद की वह एक दोसरे के रफीक हैंl (अल अनफ़ाल: १२)
इस आयत में भी उन लोगों का उल्लेख है जो ईमान लाने के बाद काफिरों और मुशरिकीन के अत्याचार के शिकार हुए और हिजरत करने पर मजबूर हुए और जिन लोगों ने उनकी मदद की और उन्हें पनाह दीl यहाँ जंग की पृष्ठभूमि नहीं हैl यह उन लोगों से संबंधित है जो मक्का से हिजरत करके मदीना आए थे और मदीना वालों ने उनकी मदद की और उन्हें पनाह दीl मगर शब्द जाह्दु का अनुवाद सिदेह सीधे “लड़े” कर दिया गयाl इससे यह मफहूम निकलता है कि जो मुसलमान हो जाए वह हर समय जंग की हालत में रहेl
“और नाज़िल होती है कोई सुरत कि ईमान लाओ अल्लाह पर और लड़ाई करो (जाह्दु) उसके रसूल के साथ हो करl (अल तौबा: ८६)
यहाँ भी जाह्दु का अनुदाद लड़ाई करो कर दिया गया हैl जबकि आयत का मफहूम है कि अल्लाह पर ईमान लाओ और इसके बाद उसके रसूल के साथ दीन के लिए जो भी संघर्ष करनी पड़े और सब्र से काम लेना पड़े और तकलीफ उठानी पड़े वह उठाएl हाँ, अगर आवश्यकता जंग की पड़े तो जंग भी करे, मगर यहाँ जाह्दु का अर्थ केवल लड़ाई या जंग नहीं हैl
एक आयत में जिहाद ए कबीर का उल्लेख हैl
“और अगर हम चाहते तो उठाते हर बस्ती में एक डराने वाला, सो तू कहा मत मां उन मुनकिरों का और मुकाबला कर उनका बड़े जिहाद सेl (अल फुरकान: ५२)
मौलाना फतह मोहम्मद जालंधरी इस आयत का अनुवाद इस प्रकार करते हैं:
“और तुम काफिरों का कहा ना मानों और उनसे इस कुरआन के हुक्म के अनुसार बड़े शद्दो मद से लड़ोl”
अब्दुल्लाह यूसुफ अली इस आयत का अंग्रेजी का अनुवाद इन शब्दों में करते हैं:
Therefore listen no to the unbelievers, but strive against them with utmost strenuousness with the (Quran).
मौलाना हबीब शाकिर इन शब्दों में अनुवाद करते हैं:
So do not follow the unbelievers, and strive against them a might striving with it.
मोहम्मद पीकथाल इस प्रकार अनुवाद करते हैं:
So obey not the disbelievers, but strive against them herewith with a great endeavor.
अनुवादक ने शब्द जिहाद ए कबीर की व्याख्या नहीं पेश की बल्कि शाब्दिक अनुवाद कर दियाl इस आयत का मफहूम यह हो सकता है कि कुफ्फार व मुनकिरिन के अकीदों को कुरआन की मदद से रद्द करो उन्हें अपने बातिल अकीदों को छोड़ने के लिए कुरआन को दलील की हैसियत से पेश करो और उन्हें तौहीद की तरफ दावत दो इसके लिए तुम्हें जो भी तकलीफें उठानी पड़ें वह उठाने के लिए तैयार रहोl अंग्रेजी के अनुवादकों ने जोह्द का अनुवाद जिहाद नहीं किया बल्कि इसके लिए जद्दो जोह्द अनुवाद किया लड़ाई या जंग नहीं किया इस आयत का अनुवाद करते समय उर्दू के अनुवादकों ने इस अम्र को दिमाग में नहीं रखा कि यह आयत मक्की है जब मुसलमान जंग की ताकत नहीं रखते थेl इसलिए फतह मोहम्मद जालंधरी के अनुसार “शद्दो मद से लड़ो” गैर मंतिकी और स्वीकार योग्य नहीं हैl “जिहाद ए कबीर” कुरआन की इस्तिलाह है जिसका मफहूम है अपने नफस के खिलाफ जिहाद करना दीन की राह में ज़ुल्म सहना पड़े और मुसलमान सब्र से इन तकलीफों को अल्लाह की रज़ा के लिए बर्दाश्त करे तो वह जिहाद ए कबीर हैl अल्लाह कहता है कुरआन के जरिये जिहाद ए कबीर करो अर्थात दीन को फैलाने के लिए कुरआन को अपना हथियार बनाओ और दीन की इशाअत के लिए सब्र व तहम्मुल के साथ जद्दो जोह्द करोl
एक और आयत से शब्द जोह्द का मफहूम अधिक स्पष्ट हो जाता हैl
और हमने ताकीद कर दी उनको अपने मां बाप से भलाई करने की और अगर वह ज़ोर करें (जाह्दाक) कि तू शरीक करे मेरा जिसकी तुझको खबर नहीं तो उनका कहना मत मानl” (अल अनकबूत: ८)
इस आयत में मुसलमानों से कहा गया है कि अपने मां बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो चाहे वह मुशरिक या काफिर हों मगर जब वह तुम्हें भी शिर्क और कुफ्र की तरगीब दें और या इसके लिए जबर करें तो उनका कहना मत मानोl यहाँ जोह्द का अर्थ तरगीब देना या उकसाना हैl लड़ाई करना नहीं हैl
कुरआन से और भी मिसालें दी जा सकती हैं इन आयतों में जोह्द या जिहाद को क़िताल का समानार्थक करार दिया गया हैl और इन्हीं अनुवादों के कारण मुसलमानों के एक बड़े वर्ग में जिहाद की गलत अवधारणा आम हो गई हैl जिहाद का अर्थ गैर मुस्लिमों से केवल जंग करना नहीं है बल्कि दीन की इशाअत के लिए सब्र करना, तकलीफ उठाना, पत्थर खा कर दुआ देना और अपने नफ्स को काबू में रखना हैl जिहाद ए कबीर की इस्तिलाह मक्की सुरह में प्रयोग की गई है जिसका मफहूम है प्रतिकूल स्थिति में सब्र व तहम्मुल से दीन के लिए काम करनाl मगर आज तक किसी मुफस्सिर या मुतर्जिम ने जिहाद ए कबीर की वजाहत नहीं की बल्कि इसका शाब्दिक अर्थ अनुवाद करने पर ही संतोष कियाl बल्कि इसका अनुवाद बड़ी जंग से किया जो मुसलमानों के लिए मक्की ज़िन्दगी में संभव ही नहीं थाl