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Thursday, May 17, 2012

तलाक शुदा महिलाओं के नान-नुफ्का को इद्दत तक बहाल रखने को महदूद करना गैर इस्लामी अमल है, Hindi Section, NewAgeIslam.com

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तलाक शुदा महिलाओं के नान-नुफ्का को इद्दत तक बहाल रखने को महदूद करना गैर इस्लामी अमल है
by मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम
शाह बानो के तलाक (इंदौर, हिंदुस्तान, 1978) का मामला हिंदुस्तानी पाठकों के मन में होगा। मुख्तसर (संक्षेप) में, जब इस मामले में शौहर ने शादी के 30 साल से ज़्यादा के बाद अपनी बीवी को तलाक दिया तो शौहर ने सिर्फ महेर का अपने पास रखा हुआ हिस्सा और तीन महीने का नान- नुफ्का अदा दिया। 62 साल की उम्र में, बिना किसी काम के तजुर्बे और गिरते स्वास्थ्य के साथ उसे शिद्दत के साथ गुजारे के लिए नान-नुफ्का की जरूरत थी और इसी सिलसिले में उसने अदालत से संपर्क किया। ये मामला निचली अदालत से हाईकोर्ट और आखीर में सुप्रीम कोर्ट की बेंच तक पहुंचा (1985)। अदालत ने शाहबानो के पक्ष में फैसला दिया, अदालत का फैसला व्यापक कुरानी पैगाम के मुताबिक था। मुस्लिम विद्वानों और जनता ने आदेश के खिलाफ ऐसे हालात पैदा किये जिसने पूरे देश को हिला कर रख दिया, उन लोगों ने फैसले को पलटने और मुस्लिम पर्सनल लॉ के अनुसार मामले को हल करने की मांग की जिसके अनुसार नान-नुफ्का केवल इद्दत के तीन महीनों तक ही मिलता है। भारत सरकार को संसद में इस मामले को उठाने पर मजबूर किया गया। बाद में सरकार ने मुस्लिम महिलाओं (तलाक से संबंधित अधिकारों की रक्षा) अधिनियम, 1986 को स्वीकार किया। मुस्लिम पर्सनल लॉ के पक्ष में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को उलट दिया गया। यह गैर इस्लामी फरमान था जिसने बहुत गरीब मुस्लिम महिला को उसके पूर्व पति से बाज़गर्द (पुनरावर्ती) नान-नुफ्के के अधिकार से इन्कार किया और इस्लामी कानून के फरसूदा हिस्से को बनाए रखा।

http://newageislam.com/hindi-section/तलाक-शुदा-महिलाओं-के-नान-नुफ्का-को-इद्दत-तक-बहाल-रखने-को-महदूद-करना-गैर-इस्लामी-अमल-है/d/7255

Wednesday, May 16, 2012

मोहम्मद यूनुस की तरफ से इस्लामी रसूमात में तरमीम की ज़रूरत पर एम. हुसैन सदर के लेख का जवाब, Hindi Section, NewAgeIslam.com

Hindi Section
मोहम्मद यूनुस की तरफ से इस्लामी रसूमात में तरमीम की ज़रूरत पर एम. हुसैन सदर के लेख का जवाब
by मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम
(3) ये अपने पैरोकारों की व्यक्तिगत विशेषताओं और साख को कमजोर करता है। अबु बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु, उस्मान बिन अफ़्फ़ान रज़ियल्लाहु अन्हु, उमर बिन खत्ताब रज़ियल्लाहु अन्हु, अली बिन अबी तालिब रज़ियल्लाहु अन्हु, उमरो बिन आस रज़ियल्लाहु अन्हु, अदब अल्लाह इब्ने अबू राबिआ रज़ियल्लाहु अन्हु के जैसे लोग जो नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के करीबी सहाबा थे, वो खानाबदोश (घुमंतू) नहीं थे। इसके अलावा, नबी करीम सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैरोकारों में ऐसे लोग थे जो बाद में गवर्नर, व्यवस्थापक और तेजी से बढ़ रहे इस्लामी साम्राज्य के खुल्फा बन गए, और वो भी आप सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम की वफात के सौ सालों के अंदर ही, इसकी हदें अटलांटिक महासागर (स्पेन) के किनारे से प्रशांत महासागर (चीन) तक फैल गई और अलग धर्म और संस्कृतियों, जिनसे इनका सामना हुआ, इससे अनगिनत लोग इस्लाम में दाखिल हो गये। कोई भी जिसे कुरान का बुनियादी इल्म है वो जानता है कि कुरान ने कई खानाबदोश (घुमंतू) अरबों के ईमान में कमजोरी (48:11) और कुछ को नेफाक़ में शदीद (9:95-97) बताया है। नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम के पैरोकारों की वज़ाहत खानाबदोश (घुमंतू) कबीलों के तौर पर करना कुरानी पैग़ाम और इतिहास दोनों में बिगाड़ पैदा करना है।

http://newageislam.com/hindi-section/मोहम्मद-यूनुस-की-तरफ-से-इस्लामी-रसूमात-में-तरमीम-की-ज़रूरत-पर-एम.-हुसैन-सदर-के-लेख-का-जवाब/d/7277

न्यूट गिंगरिच कदीम इस्लामी कानून की सरज़िनश करने वालों में अकेले नहीं हैं, Hindi Section, NewAgeIslam.com

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न्यूट गिंगरिच कदीम इस्लामी कानून की सरज़िनश करने वालों में अकेले नहीं हैं
by मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम
लेकिन अगर ये एक धर्म है, और बराये नाम कुरान का ताज पहना है, लेकिन उन धार्मिक संसाधनों के ईर्द गिर्द अपनी तामीर की है जिस पर मध्यकाल के फुकहा औऱ माहिरीने कानून इसरार करते हैं, तो ये कुरानी मॉडल: समय के विशिष्ट , सहिष्णुता, व्यापक, राजनीतिक रुझान वाला, लैंगिक न्याय, स्वतंत्रता और समानता चाहने वाले, से भिन्न और यहाँ तक कि परस्पर विरोधी हो सकता है। अगर मौजूदा फ़िक़्ही रुझान पर आधारित इस्लाम की सियासज़दा मॉडल बरकरार रहता है, तो इसके मुल्ला लोग, मजहबी पेशवा और रूढ़िवादी लोग पूरे तब्के को मध्यकाल के ज़माने का पाबंद रखे रहेंगे और इस्लाम यूरोप और पश्चिम में (वाज़ेह या खामोशी के साथ) बिल्कुल अजनबी और काबिले नफरत बना रहेगा।

http://www.newageislam.com/hindi-section/न्यूट-गिंगरिच-कदीम-इस्लामी-कानून-की-सरज़िनश-करने-वालों-में-अकेले-नहीं-हैं/d/7286


Tuesday, May 15, 2012

शादी से अलग शारीरिक सम्बंध के लिए औरतों को कोड़े मारना क्रूरता और गैर-इस्लामी अमल है, Hindi Section, NewAgeIslam.com

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शादी से अलग शारीरिक सम्बंध के लिए औरतों को कोड़े मारना क्रूरता और गैर-इस्लामी अमल है
by मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम
कुरान 'अवामी बदकारी' या ज़िना के लिए कोड़े मारने की सज़ा का हुक्म देता है उस ज़माने में एक रिवाज था जो औरतों को इजाज़त देता था कि उनके शौहर अगर व्यापार, हमले या किसी मिशन के लिए घर से दूर हों तो वो अजनबियों के साथ रह सकती हैं (24:2)। इस रिवाज ने बच्चों के पिता को तय करने का विवाद पैदा किया जो वैवाहिक जीवन से बाहर पैदा हुए बच्चों की पहचान के लिए जमा होने पर बच्चों के चेहरे मुहरे को उसके पिता से तुलना करके किया जाता था और उसके बाद बच्चों के पिता का फैसला किया जाता था [3]। ये अमल, एक सामाजिक मेयार बन गया था, जो मर्दों को औरतों, जिनके साथ उन्होंने अस्थायी शादी की थी या साथ रहे थे, उनके प्रति सभी सामाजिक और वित्तीय ज़िम्मेदारियों से मुक्त करता था, यो औरतों को आर्थिक फायदे के लिए बदकारी पर मजबूर करता था, और इस तरह के संबंधों से पैदा हुए बच्चों को समाज के रहमो करम पर छोड़ देते थे। ये कुरान के परिवार कानून के बिल्कुल विरोधी था जो (1) पुरुषों को यौन, आर्थिक और सामाजिक लाइसेंस से महरूम करने, (2) बदकारी को संस्थागत बनने को खत्म करने, (3) औरतों को कानूनी, आर्थिक, विरासत और व्यक्तिगत अधिकार प्रदान करने और (4) तौलीदी मरहले में औरतों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए था। इसलिए एक हंगामी (आपात) कदम के तौर पर इश्तेआल अंगेज़ अमल को कुरान को रोकना था, जिसके लिए एक खास शब्द, 'ज़िना' (25:68, 17:32) और साथ ही साथ 'फाहिशतः' की आम शब्दावली का इस्तेमाल करता है (4:15)। उसी के मुताबिक, कुरान नबी सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम से फरमाता है, जब आपकी खिदमत में मोमिन औरतें इस बात पर बैअत करने के लिए हाज़िर हों कि वो अल्लाह के साथ किसी चीज़ को शरीक नहीं ठहरायेंगी औऱ चोरी नहीम करेंगी औऱ बदकारी नहीं करेंगी (60:12), तो उनकी बैअत कुबूल कर लिया करें।

http://newageislam.com/hindi-section/शादी-से-अलग-शारीरिक-सम्बंध-के-लिए-औरतों-को-कोड़े-मारना-क्रूरता-और-गैर-इस्लामी-अमल-है/d/7300

नौकरानियों और कॉल गर्ल्स वगैरह के साथ बग़ैर शादी के यौन संबंध

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नौकरानियों और कॉल गर्ल्स वगैरह के साथ बग़ैर शादी के यौन संबंध के औचित्य को पेश करने के लिए नकल की जाने वाली कुरान आयात पर नई बसीरत
by मोहम्मद यूनुस, न्यु एज इस्लाम
"और तुम में से जो कोई (इतनी) इस्तताअत न रखता हो कि आज़ाद मुसलमान औरतों से निकाह कर सके तो उन मुसलमान कनीज़ों से शादी कर ले जो (शरअन) तुम्हारी मिल्कियत में हैं, और अल्लाह तुम्हारे ईमान (की कैफियत) को खूब जानता है, तुम (सब) एक दूसरे के जिंस में से ही हो, पस इन (कनीज़ों) से इनके मालिकों की इजाज़त के साथ निकाह करो और उन्हें उनके महेर हस्बे दस्तूर अदा करो इससे पहले कि वो (इफ्फत कायम रखते हुए) कैदे निकाह में आने वाली हों, न बदकारी करने वाली हों और न दरपरदा आशनाई करने वाली हों, पस जब वो निकाह के हिसार में आ जायें फिर अगर बदकारी की मुर्तकिब हों तो इन पर उस सज़ा की आधी सज़ा लाज़िम है जो आज़ाद (कुंवारी) औरतों के लिए (मोक़र्रर) है, ये इजाज़ट उस शख्स के लिए है जिसे तुममें से गुनाह (के इर्तेकाब) का अंदेशा हो, और अगर तुम सब्र करो तो (ये) तुम्हारे हक़ में बेहतर है, और अल्लाह बख्शने वाला मेहेरबान है"(4:25)।

http://newageislam.com/hindi-section/नौकरानियों-और-कॉल-गर्ल्स-वगैरह-के-साथ-बग़ैर-शादी-के-यौन-संबंध-के-औचित्य-को-पेश-करने-के-लिए-नकल-की-जाने-वाली-कुरान-आयात-पर-नई-बसीरत/d/7312