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Friday, August 9, 2019

Sectarianism under the Guise of Kashmir कश्मीर की आड़ में साम्प्रदायिकता



शकील शम्शी
७ अगस्त, २०१९
अक्टूबर १९४७ ई० में कश्मीर के महाराजा को कश्मीर का भारत से सहबद्ध करना पड़ा था वहाँ की जनता तीन वर्गों में बट गईl एक वर्ग आज़ाद राज्य, दोसरा वर्ग पाकिस्तान के साथ एकीकरण और तीसरा वर्ग भारत के साथ सहबद्धता का इच्छुक थाl सच बात तो यह है कि उस समय से ले कर आज तक कश्मीर इनही तीन वर्गों में बटा हुआ हैl मेरी बात का सबूत है कि आज़ादी, अलगाव और पाकिस्तान से एकीकरण के बारे में सभी आतंकवादी घटनाएं हिंसक प्रदर्शन कश्मीर के केवल आठ नौ शहरों तक ही सीमित रहे हैंl आपने ना तो कभी करगिल में हंगामे की बात सुनी होगीl ना आप ने लद्दाख में कभी किसी प्रकार की शोरिश देखी होगी और ना ही जम्मू रीजन के किसी क्षेत्र में फ़ौज पर पत्थर बाज़ी करते हुए किसी मुस्लिम युवक को देखा होगाl आपने यह भी कभी नहीं सूना होगा कि कठुआ, पुंछ, राजौरी, और डोडा जैसे क्षेत्रों में भारत के खिलाफ कोई प्रदर्शन हुआ हो जब कि इनमें से कई स्थान मुस्लिम बहुल हैंl सभी प्रकार की हंगामा आराई श्रीनगर, बड़गाम, शोपियान, पुलवामा, अनन्त नाग, बारहमुला, कुलगाम, गान्दरबिल और बांडी पूरा तक ही सीमित रहती हैl इनही स्थानों को भारत विरोधी सरगर्मियों का केंद्र बना दिया गया है हालांकि वहाँ भी हज़ारों ऐसे लोग मौजूद हैं जो ना केवल प्रदर्शनों में शरीक होते हैं और ना ही अपने बच्चों को पत्थर बाज़ी करने की अनुमति देते हैं, यह वर्ग ऐसा है जो पाकिस्तान के साथ सहबद्ध के कल्पना को आत्महत्या के बराबर और आतंकवाद को हराम और इस्लाम की बदनामी का कारण समझता हैl इन क्षेत्रों में कश्मीरी आतंकवादियों ने हालात ऐसे बिगाड़े हैं कि आज आम कश्मीरी अपने बच्चों को मस्जिदों में भेजते हुए डरने लगे हैंl कुछ माह पहले मेरे एक दोस्त कश्मीर से आए तो बातों बातों में कह गए कि कश्मीर के हालात इतने खराब कर दिए गए हैं कि हम अपने बेटे को मस्जिद में नमाज़ पढ़ने के लिए अकेले नहीं भेज सकतेl हमको इस डर से साथ जाना पड़ता है कि कहीं बच्चे को अकेला पा कर आतंकवादियों का एजेंट गुमराह ना कर दे, कहीं पत्थर बाजों के गिरोह अपने साथ पथराव करने पर मजबूर ना कर दें और अगर उनसे हमारा बेटा बाख भी जाए तो कुछ अजब नहीं कि पुलिस वालों के हत्थे चढ़ जाएl यह बात सुन कर लगा कि कश्मीर के आम लोग हिंसा और आतंकवाद से खुद को अलग रखना चाहते हैं, मगर उनकी मदद करने वाला कोई नहीं हैl अफ़सोस की बात यह है कि हमारे देश का फिरका परस्त वर्ग और गुमराह करने वाला मीडिया ऐसे कश्मीरियों का दर्द समझने के बजाए सब पर आतंकवादी लेबल लगा देता हैl
भारत से प्यार रखने वाले मुसलमान कश्मीरियों को बिलकुल फ़रामोश करके वतन से वफादारी को केवल कश्मीरी पंडितों से जोड़ा जाना भी उसी तर्ज़ ए अमल का एक नमूना हैl कोई ऐसे मुसलमानों की हौसला अफजाई नहीं करता जो अलगाववाद की किसी तहरीक में शामिल नहीं होतेl कोई भी भारतीय राजनीतिज्ञ इन मुसलमानों की प्रशंसा में एक शब्द भी नहीं कहता, डोडा, कठुआ, राजौरी, पुंछ, लेह, लद्दाख और करगिल में भारतीय झंडे के साए में रहने को पसंद करते हैंl किसी को यह बात प्रशंसनीय नहीं लगती कि जम्मू व लद्दाख के मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में मज़ाह्मती तहरीकें नहीं चलती या आतंकवादी घटनाएं नहीं होतींl अफ़सोस की बात यह है कि कश्मीर से भारत के सहबद्ध के हामी कश्मीरी मुसलमानों की हौसला अफजाई करने के बजाए फिरका परस्त मानसिकता वाले लोग उन पर भी पाकिस्तान का झंडा चढ़ा देते हैंl हर आदमी के खौफ की वजह से कश्मीर से भागने पर मजबूर हुए उनका कोई उल्लेख करने वाला नहीं? कश्मीरी पंडितों और सिखों पर आतंकवादियों ने जो हमले किये उनका हिसाब किताब तो सब के पास है, लेकिन जो कश्मीरी मुसलमान आतंकवादियों की गोलियों का निशाना बने उनकी लाशों पर रोने वाला कोई नहीं? भारतीय फ़ौज में शामिल कश्मीरी सिपाहियों और जम्मू व कश्मीर की पुलिस में शामिल मुस्लिम अहलकारों पर कैसे कैसे मज़ालिम दहशत गर्दों ने नहीं तोड़े मगर किसी फिरका किसी फिरका परस्त को उनकी कुर्बानियां याद करने का समय नहीं मिलताl कश्मीर के कब्रिस्तान आतंकवादियों के हाथों मरने वाले वतन परस्त मुसलमानों की कब्रों से पूरी तरह भर चुके हैंमगर जब भी कोई बात करता है वह कश्मीरी पंडितों पर अत्याचार का उल्लेख करता है वतन से प्यार करने के जुर्म में मौत की सज़ा पाने वाले कश्मीरी मुसलमानों का नहींl अर्थात केवल कुछ दहशत पसंद नहीं कुछ तथाकथित देशभक्त भी कश्मीर के मसले को हिन्दू और मुसलमान का झगड़ा बनाना चाहते हैं, जबकि हमारा मानना यह है कि कश्मीर का मसला हिन्दू मुस्लिम का नहीं, यह हिंदुस्तानियत और इंसानियत का मामला है, आतंकवादियों के हाथों जीतने अत्याचार पंडितों ने झेले हैं उतने ही कश्मीरी मुसलमानों ने भी सहे हैंl इसलिए जो लोग कश्मीर के मामले को फिरका परस्ती के चश्मे से देख रहे हैं वह इस देश को लाभ नहीं हानि पहुंचा रहे हैंl
७ अगस्त, २०१९, सौजन्य से: इंकलाब, नई दिल्ली

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